कुछ कहानियां सिर्फ पढ़ी नहीं जातीं, वे भीतर कहीं गहरे उतर जाती हैं। भारत के इतिहास में ऐसी कई हस्तियां हुई हैं जिन्होंने साधारण हालात से निकलकर असाधारण मुकाम हासिल किया, और अपने पीछे ऐसी कहानियां छोड़ गईं जो आज भी लाखों लोगों को हिम्मत देती हैं। आइए मिलते हैं कुछ ऐसी ही शख्सियतों से।
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की कहानी शायद सबसे ज़्यादा सुनी और सुनाई जाने वाली कहानी है, और इसकी वजह भी साफ है। रामेश्वरम के एक साधारण परिवार में जन्मे कलाम बचपन में अखबार बांटकर परिवार की मदद करते थे। यही बच्चा आगे चलकर देश के मिसाइल कार्यक्रम का नेतृत्व करने वाला वैज्ञानिक बना और फिर भारत का राष्ट्रपति भी। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह रही कि इतने बड़े पद पर पहुंचकर भी उन्होंने अपनी सादगी कभी नहीं छोड़ी। बच्चों से बात करना, उनके सवालों का जवाब देना, उन्हें सपने देखने के लिए प्रेरित करना, यही उनकी असली पहचान बन गई।
महात्मा गांधी की कहानी भी कुछ अलग नहीं है। लंदन से कानून की पढ़ाई करने वाला एक शर्मीला वकील दक्षिण अफ्रीका में हुए भेदभाव के अनुभव के बाद पूरी तरह बदल गया। सत्य और अहिंसा जैसे साधारण से दिखने वाले हथियारों से उन्होंने एक विशाल साम्राज्य के खिलाफ आंदोलन खड़ा किया। नमक सत्याग्रह हो या असहयोग आंदोलन, गांधी जी ने यह साबित किया कि बड़ा बदलाव लाने के लिए हमेशा बड़ी ताकत की ज़रूरत नहीं होती, दृढ़ इच्छाशक्ति ही काफी होती है।
स्वामी विवेकानंद की कहानी युवाओं के लिए खासतौर पर प्रेरणादायक है। कोलकाता में जन्मे नरेंद्रनाथ दत्त आगे चलकर रामकृष्ण परमहंस के शिष्य बने और स्वामी विवेकानंद के नाम से जाने गए। साल 1893 में शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में जब उन्होंने अपना भाषण शुरू किया, तो पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। उन्होंने भारत की आध्यात्मिक सोच को दुनिया के सामने बड़े गर्व से रखा, और युवाओं से हमेशा कहा कि खुद पर भरोसा रखो, यही सबसे बड़ी ताकत है।
मिल्खा सिंह की कहानी संघर्ष और जज्बे की मिसाल है। बंटवारे के दौरान अपने परिवार को खोने वाले मिल्खा सिंह ने शरणार्थी शिविर से निकलकर भारतीय सेना ज्वाइन की, और वहीं से उनकी दौड़ने की यात्रा शुरू हुई। 1960 के रोम ओलंपिक में वे मामूली अंतर से पदक चूक गए, लेकिन उनकी मेहनत और लगन ने उन्हें "फ्लाइंग सिख" का खिताब दिलाया। हार के बाद भी हार न मानने का उनका जज्बा आज भी खिलाड़ियों के लिए एक मिसाल है।
कल्पना चावला की कहानी हर उस लड़की के लिए प्रेरणा है जो बड़े सपने देखने से डरती है। हरियाणा के करनाल में जन्मी कल्पना ने एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और आगे चलकर नासा में अंतरिक्ष यात्री बनीं। वे अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला थीं। साल 2003 में कोलंबिया स्पेस शटल हादसे में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी कहानी आज भी हर उस बच्ची के लिए मशाल की तरह जलती रहती है जो आसमान से भी ऊंचा सपना देखती है।
सुधा मूर्ति की कहानी थोड़ी अलग है, लेकिन उतनी ही प्रेरक। जब टेल्को (अब टाटा मोटर्स) ने एक विज्ञापन में साफ लिखा कि सिर्फ पुरुष उम्मीदवार आवेदन करें, तो सुधा मूर्ति ने सीधे जेआरडी टाटा को पोस्टकार्ड लिखकर इस भेदभाव पर सवाल उठाया। नतीजा यह हुआ कि उन्हें कंपनी की पहली महिला इंजीनियर बनने का मौका मिला। आगे चलकर उन्होंने इंफोसिस फाउंडेशन के ज़रिए समाज सेवा में भी बड़ा योगदान दिया, और आज भी अपनी सादगी और सोच के लिए जानी जाती हैं।
इन सभी कहानियों में एक बात समान है, हर किसी ने किसी न किसी मोड़ पर मुश्किल हालात का सामना किया, लेकिन हार मानने के बजाय आगे बढ़ने का रास्ता चुना। शायद यही वजह है कि ये कहानियां सिर्फ इतिहास के पन्नों में नहीं, बल्कि हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी हमें आगे बढ़ने की ताकत देती रहती हैं।
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